प्रेमचंद
प्रेमचंद जिनका मूल नाम धनपतराय श्रीवास्तव था। यह नवाबराय नाम से उर्दू में रचना करते थे। हिंदी साहित्य में प्रेमचंद का अद्भुत योगदान है चाहे वह उपन्यास , कहानी का क्षेत्र हो या नाटक का प्रेमचंद ने सभी विधाओं पर अपनी लेखनी चलाई है। प्रेमचंद्र जी का कथन, "सौभाग्य उन्हीं को प्राप्त होता है जो अपने कर्तव्य पथ पर अविचल रहते हैं।" प्रेमचंद जी भी अपने कर्तव्य पथ पर अजीवन अवीचल रहे, इन्होंने पंद्रह उपन्यास, तीन सौ से अधिक कहानियां लिखे जो मानसरोवर के आठ भागों में संकलित हैं। इन्होंने नाटक भी लिखे संग्राम, कर्बला, प्रेम की वेदी, दस अनुवाद, सात बाल पुस्तके आदि भी लिखे। प्रेमचंद ने मर्यादा, माधुरी, हंस ,जागरण आदि पत्रिका का संपादन भी किया है।
पहले-पहल प्रेमचंद जी नवाबराय नाम से रचना करते थे।उनकी पहली कहानी संग्रह 'सोजे वतन' नाम से निकला, जिसमें पांच कहानियां संकलित हैं। इनकी सभी कहानी में देश प्रेम, जनता के दर्द आदि का वर्णन था ,जिससे अंग्रेजी शासकों को इस कहानी संग्राह में बगावत की बू आने लगी और अंग्रेजी शासकों ने इस कहानी संग्रह को जब्त कर आग लगा दिया और कभी ना लिखने का आदेश दिया।इसके बाद उर्दू पत्रिका जमाना के संपादक दया नारायण निगम में इन्हें प्रेमचंद नाम दिया तब से यह प्रेमचंद नाम से अपनी रचना लिखते रहे।
प्रेमचंद पहले उर्दू में उपन्यास लिखते थे और फिर उसे हिंदी में अनुवाद करते थे। उन्होंने हिंदी में मौलिक उपन्यास भी कई लिखे।इनकी रचनाओं में दहेज प्रथा, अनमेल विवाह,छुआछूत, विधवा विवाह, आधुनिकता, स्त्री- पुरुष समानता आदि विषयों पर अपनी कलम चलाई। शुरुआती दौर में प्रेमचंद जी आदर्शवादी रचना लिखते थे पर बाद में इन्होंने देश की दशा को देख यथार्थवादी रचना लिखने लगे,गोदान तक आते आते इनकी दृष्टि यथार्थवादी हो गई थी,इसलिए इन्हें आदर्शोंन्मुख यथार्थवादी रचनाकार कहा जाने लगा। 'नगेंद्र' के शब्दों में,"उन्होंने हिंदी कथा साहित्य को मनोरंजन के स्तर से उठाकर जीवन के साथ सार्थक रूप से जोड़ने का कार्य किया।"
प्रेमचंद सच्चे भारतीय थे। उनके उपन्यास रंगभूमि में प्रमुख पात्र सूरदास लगातार ब्रिटिश शासक के द्वारा दी गई उनके जमीन की कीमत के खिलाफ आवाज ही नही उठाता बल्कि लड़ता भी है।प्रेमचंद अपने रचना के पात्र हमेशा परिवेश के अनुसार ही चुनते है। 'हजारी प्रसाद द्विवेदी' ने कहा," अगर आप उत्तर भारत की समस्त जनता के अचार,व्यवहार,रहन-सहन, दुःख-सुख जानना चाहते हैं तो प्रेमचंद से उत्तम परिचालक आपको नहीं मिल सकता।"
प्रेमचंद की कोई भी रचना हो उसे समान से समान जनता उसे पढ़ भी सकती है और आसानी से समझ भी सकती है।'रामचंद्र शुक्ल' ने अपने "हिंदी साहित्य के इतिहास" में लिखा है," साहित्य जनता की चित्तवृतियों का संचित प्रतिबिंब है।" प्रेमचंद का सम्पूर्ण साहित्य जनता की चित्तवृतियों का सच्चे अर्थों में संचित प्रतिबिंब ही है।
'सुमित्रानंदन पंत'के शब्दों में,"प्रेमचंद ने नवीन भारतीयता एवं नवीन राष्ट्रीयता का समुज्जवल आदर्श प्रस्तुत कर गांधीजी के समान ही देश का पथ प्रदर्शन किया।"
प्रेमचंद को सिर्फ हिंदी क्षेत्र से जुड़े हुए लोग ही नही जानते बल्कि विभिन्न क्षेत्रों से संबंधित लोग भी जानते हैं। इनके नाम में ही प्रेम है जो सम्पूर्ण जगत को जोड़ें रहता है और इन्हें अपनी जनता से कितना प्रेम है वह हम सब इनके रचनाओं के जरिए जान रहे हैं ।
प्रेमचंद जी के बारे में जितना लिखो काम ही है। इनके बारे में कहने के लिए शब्द कम पड़ सकते है पर हिंदी जगत में इनका योगदान कम कभी नही पड़ सकता है। इनका योगदान अद्वितीय है....
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