भारतीय भाषाओं में न्यायिक प्रक्रिया
भारतीय भाषाओं में न्यायिक प्रक्रिया उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय की भाषा अंग्रेजी होने के कारण उसके निम्न न्यायालयों में भी इस भाषा का प्रभाव पड़ना अनिवार्य हैं। जिला न्यायालयों में भी अंग्रेजी का वर्चस्व बढ़ने लगा, ज्यादातर भारतीयों को अंग्रेजी भाषा का ज्ञान नहीं है। भारत में प्रचलित हिंदी 40 करोड़ लोगों की मातृभाषा है और दुनिया की तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा हैं।अधिकतर लोगों को अंग्रेजी भाषा का ज्ञान ही नहीं है, तो उस भाषा में न्याय करना कहां तक न्यायसंगत हैं ? न्याय की देवी आंखों पर पट्टी इसलिए बाँधे रखती है क्योंकि उसे निष्पक्ष रहना है। सामाजिक न्याय पाने के लिए सुनिश्चित करना होगा कि कानून और नीतियां सभी व्यक्तियों पर समान हो। सामाजिक न्याय के लिए यह जरूरी है कि सब लोगों के साथ साथ कानूनी नीतियों और भाषाओं के साथ भी समान बर्ताव करना चाहिए। न्याय मतलब हर वाजिब व्यक्ति को उसका वाजिब हिस्सा देना होगा ।
हमारे देश का संविधान 2 वर्ष, 11 माह तथा 18 दिन की अवधि में निर्मित हुआ तथा 26 जनवरी, 1950 को लागू हुआ था। स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व देश में स्वतंत्रता आंदोलन के साथ-साथ हिंदी को देश की राष्ट्रभाषा बनाये जाने की सर्वाधिक मांग की जाती रही थी| संविधान निर्माताओं ने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाए जाने की मांग को दृष्टिगत रखते हुए संविधान सभा ने 14/9/1949 को हिंदी को संघ की राजभाषा स्वीकार करते हुए राजभाषा हिंदी के संबंध में प्रावधान किए। भारतीय संविधान में 22 भारतीय भाषाओं को राजभाषा के रूप में मान्यता मिली है। ये भाषाएँ इस प्रकार हैं-हिंदी, पंजाबी, उर्दू, कश्मीरी, संस्कृत, असमिया, ओड़िया, बांगला, गुजराती, मराठी, सिंधी, तमिल, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़, मणिपुरी, कोंकणी, नेपाली, संथाली, मैथिली, बोड़ो व डोगरी। भारत के संविधान के अनुसार अंग्रेजी ना ही राजभाषा है और ना ही भारत की 22 भाषाओं में शामिल ही हैं, फिर भी इस अंग्रेजी भाषा में उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में सभी कार्यों का सम्पादन होता है। भारतीय संविधान के धारा 348 में इसका वर्णन हैं। अनुच्छेद 348 के अनुसार उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में और अधिनियमों, विधेयकों आदि के लिए प्रयोग की जाने वाली भाषा--
1.इस भाग के पूर्वगामी उपबंधों में किसी बात के होते हुए भी, जब तक संसद् विधि द्वारा अन्यथा
उपबंध न करे तब तक--
a .उच्चतम न्यायालय और प्रत्येक उच्च न्यायालय में सभी कार्यवाहियां अंग्रेजी भाषा में होंगी,
b.i संसद् के प्रत्येक सदन या किसी राज्य के विधान-मंडल के सदन या प्रत्येक सदन में पुरःस्थापित किए जाने वाले सभी विधेयकों या प्रस्तावित किए जाने वाले उनके संशोधनों के,
ii संसद या किसी राज्य के विधान-मंडल द्वारा पारित सभी अधिनियमों के और राष्ट्रपति या किसी राज्य के राज्यपाल द्वारा प्रख्यापित सभी अध्यादेशों के ,और
iii इस संविधान के अधीन अथवा संसद या किसी राज्य के विधान-मंडल द्वारा बनाई गई किसी विधि के अधीन निकाले गए या बनाए गए सभी आदेशों, नियमों, विनियमों और उपविधियों के, प्राधिकृत पाठ अंग्रेजी भाषा में होंगे।
2. खंड(1) के उपखंड (क) में किसी बात के होते हुए भी, किसी राज्य का राज्यपाल राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से उस उच्च न्यायालय की कार्यवाहियों में, जिसका मुख्य स्थान उस राज्य में है, हिन्दी भाषा का या उस राज्य के शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाली किसी अन्य भाषा का प्रयोग प्राधिकृत कर सकेगाः परंतु इस खंड की कोई बात ऐसे उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए किसी निर्णय, डिक्री या आदेश को लागू नहीं होगी।
3. खंड (1) के उपखंड (ख) में किसी बात के होते हुए भी, जहां किसी राज्य के विधान-मंडल ने,उस विधान-मंडल में पुरःस्थापित विधेयकों या उसके द्वारा पारित अधिनियमों में अथवा उस राज्य के राज्यपाल द्वारा प्रख्यापित अध्यादेशों में अथवा उस उपखंड के पैरा (iv) में निर्दिष्ट किसी आदेश, नियम, विनियम या उपविधि में प्रयोग के लिए अंग्रेजी भाषा से भिन्न कोई भाषा विहित की है वहां उस राज्य के राजपत्र में उस राज्य के राज्यपाल के प्राधिकार से प्रकाशित अंग्रेजी भाषा में उसका अनुवाद इस अनुच्छेद के अधीन उसका अंग्रेजी भाषा में प्राधिकृत पाठ समझा जाएगा।
अंग्रेजी का अपना महत्व वैश्विक फलक में है,इसकी महत्ता को नकारा नहीं जा सकता लेकिन इससे यह आवश्यक नहीं है कि भारत जैसे देश में न्याय, शासन, प्रशासन आदि का काम इसी भाषा में हो जिसे देश के आधे से ज्यादा नागरिक जानते ही नहीं हैं।संविधान की धारा 348 में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट के कामकाज की भाषा अंग्रेजी होगी लेकिन यदि संसद चाहे तो इस स्थिति को बदलने के लिए कानून बना सकती है। इसी तरह हाईकोर्ट के कामकाज की भाषा भी अंग्रेजी है, लेकिन राष्ट्रपति की पूर्वानुमति लेकर राज्यपाल अपने राज्य में स्थित हाईकोर्ट को हिंदी या उस राज्य की सरकारी भाषा में काम काज करने के लिए कह सकते हैं। देश के सभी निम्न अदालतों में संपूर्ण कामकाज हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं में होता है,किंतु उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालयों में यही काम अंग्रेजी में होता है। विडंबना यह है की न्यायधीश हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं को जानते हुए भी दस्तावेजों को अंग्रेजी में अनुवाद करवाते हैं। "यह देश और संविधान की विडंबना है कि अनुच्छेद 19 के 343,346,347,350 और 351 कहीं भी अंग्रेजी की बाध्यता का जिक्र नहीं है। अनुच्छेद 19 में भारत के सभी नागरिकों को 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' अपनी भाषा में व्यक्त करने का मूल अधिकार दिया गया है।"1 देश की वर्तमान न्यायपालिका का स्वरूप त्रिकोण है।न्याय व्यवस्था के प्रथम स्तर पर उच्चतम न्यायालय, दूसरे स्तर पर उच्च न्यायालय और अंतिम स्तर पर जिला न्यायालय है। ज्यादातर लोग उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय जाने में असमर्थ है।
अंग्रेजी भाषा का प्रभाव आजकल जिला न्यायालय में अत्यधिक तौर पर पड़ रहा है। जनगणना के आंकड़ों के अनुसार देश में अंग्रेजी भाषी लोग मात्र 0.021% ही हैं।1% से भी कम लोग द्वारा यह भाषा बोली जाती है और जब इस भाषा में जिला न्यायालय में निर्णय ली जाएगी तो अधिकांश जनता में गोपनीयता और पारदर्शिता का अभाव रहेगा।आम जनता अपने न्यायज्ञ की कही गई बातों पर आँखें मूंद विश्वास करेगें और उसे करना ही पड़ेगा क्योंकि आम जनता को अंग्रेजी आती नहीं है।अगर यही न्याय हिंदी भाषा में होती है तो आम जनता न्यायज्ञ की बातों को आँखें मूंदकर स्वीकार करने के बजाय उसे आलोचनात्मक दृष्टि से उस पर प्रासंगिक बातें कर सकते है चूंकि उन्हें उस भाषा का सम्पूर्ण ज्ञान है अतः वह नियमावलियों और प्रक्रियाओं को समझ पायेंगे, वे किसी विशेष वर्ग के अधीन नहीं होगे कि कोई उन्हें कई सारी बातों को समझाये, उनमें आत्मनिर्भरता आयेगी| हिंदी भारत की मानक भाषा है। 1965 में हिंदी को भारत की आधिकारिक भाषाओं में स्वीकार किया गया है।
जनता न्यायालय की अनुमति से अपना केस खुद लड़ सकते हैं यह हमारा नैसर्गिक अधिकार है। जब न्याय अंग्रेजी भाषा में होगी तो उस समय वही लोग अपना केस लड़ सकते हैं ,जिसे अंग्रेजी का ज्ञात हो यदि हिंदी में न्यायालय की भाषा होगी तो आम जनता आसानी से अपना केस लड़ सकते बिना किसी संकोच के।अपनी भाषा में हम जिस प्रकार तर्क वितर्क कर सकते हैं वह किसी अन्य भाषा में नहीं कर सकते हैं। डॉ. कामता प्रसाद गुरु के अनुसार 'भाषा वह साधन है जिसके द्वारा मनुष्य अपने विचार दूसरों तक भलीभाँति प्रकट कर सकता है और दूसरों के विचार स्पष्टतया समझ सकता है।’भारतीय लोगों की मातृभाषा हिंदी होने के कारण भारतीय जनता को न्याय हिंदी में ही मिलनी चाहिए।
सुमित्रानंदन पंत के अनुसार "हिंदी हमारे राष्ट्र की अभिव्यक्ति का सरलतम स्त्रोता है।" हम अपने राष्ट्र को हिंदी के माध्यम से सरलतम ढंग से अभिव्यक्त कर सकते हैं। हिंदी हमारे लिए अभिव्यक्ति का श्रेष्ठ साधन है।
न्यायिक सुधार का एक महत्वपूर्ण पहलू अदालत की कार्यप्रणाली और न्यायिक प्रक्रियाओं को पूर्ण संचालित करना है, ताकि मामलों में शीघ्र ही निपटारा किया जाए। वाम पत्र लिखने का तरीका तथा शब्दावली दोनों ही आम लोगों की समझ से परे होता है।निर्णय की भाषा सरल होनी चाहिए ताकि आसानी से समझा जाए।जिला न्यायालय से ही अधिकतर को न्याय की अपेक्षा रहती है अगर यहां भी हिंदी के बजाय अंग्रेजी में काम हो तो जनता को बहुत सारी परेशानियों का सामना करना पड़ेगा।आम जनता इस न्याय व्यवस्था से पूर्णता असंतुष्ट हो जाएगी। जरूरत है कि न्याय को सुलभ,सस्ता और न्यायिक प्रक्रिया को जनोन्मुखी बनाने के लिए कानूनों के साथ-साथ न्याय की भाषा में बदलाव किया जाए जिससे जनता की अदालत में होने वाली घटनाओं और परेशानी से बचा जा सके।
1:- https://www.jansatta.com
स्त्रोत:https://www.tripurauniv.ac.in
https:// hindi.lawralo.com
अति विश्लेषणात्मक लेख
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