'प्रेमचंद की उर्जा शिवरानी देवी।'

शिवरानी देवी का जन्म 1889 ई0 में हुआ था पर तारीख का पता आज तक नहीं चला। इनकी शादी 11 वर्ष की उम्र मे हुई थी। शादी के कुछ ही दिन हुए ही थे कि यह विधवा हो गई थी,इतनी कम उम्र की होने के कारण उन्हें पता ही नहीं था कि विधवा क्या होता है। इनके पिता मुंशी देवीप्रसाद अपने बेटी की दूसरी शादी करवाना चाहते थे। इन्होंने अपनी पुस्तक "कायस्थ बाल विधवा उध्दारक पुस्तिका" लिखे, जिसमें बेटी के पुनर्विवाह के संबंध में विज्ञापन छपा था।इस विज्ञापन को पढ़कर ही प्रेमचंद ने उनसे शादी का प्रस्ताव भेजा। देवीप्रसाद जी ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिये और दोनों का विवाह 1905 में हुआ। शिवरानी देवी प्रेमचंद की दूसरी पत्नी बनी। शिवरानी देवी पढ़ी-लिखी नहीं थी पर शादी के बाद प्रेमचंद ने उन्हें पढ़ाया।उन्हें साहित्य में रुचि नहीं थी पर प्रेमचंद्र को पढ़ते,लिखते देखकर उनकी भी रुचि साहित्य में होने लगी।
             यह इतनी उदात्त थी कि इन्हें जब पता चला कि प्रेमचंद की पहली पत्नी जिंदा है, मरी नहीं है तो वह प्रेमचंद को कहने लगी कि उन्हें घर ले कर आइए। "आप कृपया करके उन्हें ले आइये।" प्रेमचंद लाने को तैयार नहीं हुए तो वह उन्हें 'प्रिय बहन' करके पत्र लिख कर भेजी, पर वह आई नहीं।
          शिवरानी देवी सिर्फ प्रेमचंद के घर की ही स्वामी नहीं, बल्कि प्रेमचंद के ह्रदय की भी स्वामी थी। प्रेमचंद जो भी करते थे इन से पूछ कर ही करते थे। गोरखपुर में अध्यापन कार्य छोड़ते वक्त भी प्रेमचन्द ने उनसे पूछा था। इन्होंने दो-चार दिन का समय लिया था, पर फिर सोच विचार करके वह बोली 'छोड़ दीजिए नौकरी को।' प्रेमचंद का पूरा साथ देने वाली उनकी रानी शिवरानी देवी ही थी।
          प्रेमचंद को कभी भी घर के कार्य तथा पैसों की फिक्र यह करनी नहीं देती थी। प्रेमचंद एक- न- एक काम हमेशा ले लेते थे और उसे पूरा उनकी पत्नी शिवरानी देवी जी को ही करना पड़ता है।प्रेमचंद स्वयं कहते हैं कि," मुझे विश्वास रहता है कि मैं जिस काम के लिए हाथ लगा लूंगा उसे तुम पूरा कर दोगी।"एक घटना है कि 'कहारी' पानी भरने कुएं पर गई तो कुएं का जगत कच्चा था। वह प्रेमचंद को बोली उन्होंने भट्ठे जाकर 4000ईटों के लिए आर्डर देकर आए और माधुरी ऑफिस में काम से उन्हें बुलाया गया तो वह चले गए। उसे पूरा शिवरानी देवी ने ही करवाया। 
         शिवरानी देवी सशस्त, सुव्यवस्थित और सुझ-बूझ वाली राजनीतिक महिला है। स्त्री को आभूषणों की कितनी बड़ी लालसा होती है यह हम लोग जानते ही हैं। कोई भी स्त्री आभूषण के बिना नहीं रह सकती।अगर उसे खाना न देकर आभूषण दे दे तो वह ज्यादा खुश हो जाती है और अगर आभूषण पति द्वारा दिया जाता है तो वह दोगुनी खुश हो जाती है। पर शिवरानी देवी ऐसे स्त्रियों में नहीं आती है। प्रेमचंद उन्हें कोनों के फूल खरीदने को कहते हैं एक प्रकार से जिद्द ही कर बैठते हैं पर उन्होंने खरीदा नही, दोनों का संवाद देखिए। 
         "यह फूल तुम ले लो 
         फूल।लेकर क्या होगा
         बहुत खूबसूरत है, ले लो, कान में पहनना
         मुझे जरूरत नहीं।"
घर में आकर प्रेमचंद कहते हैं क्यों नहीं मानी मेरी बात तो उन्होंने कहा,"मैं तो कसम खायें हूं। वह तो आपको मालूम ही है। जिस साल महात्मा जी गोरखपुर में आए थे, उसी समय मैंने कसम खाई थी और महात्मा जी ने स्त्रियों की मीटिंग में कहा था जिस देश के मनुष्य की कमाई का औसत डेढ़ आना हो उन स्त्रियों को जेवर पहनने का हक ही क्या है, उन स्त्रियों को जेवर नही पहनना चाहिए।"
            शिवरानी देवी प्रेमचंद के अंतिम दिनों में भी उनके साथ रहती थी।प्रेमचन्द ने कहा भी था कि तुम मेरी पहली पत्नी रही होती तो मेरा जीवन आज कुछ ओर ही रहता। प्रेमचंद की पहली पत्नी के बाद प्रेमचंद का दूसरी स्त्री से संबंध था और या संबंध दूसरी शादी के बाद भी कुछ दिनों तक रहा। यह बातें प्रेमचंद्र शिवरानी देवी को अपने अंतिम दिनों में बताएं।उस पर उन्होनें कहा मुझे पता है तब प्रेमचंद आश्चर्य से उन्हें देखते हुए कहा, "तुम बहुत बड़ी हो, उम्र से ही नहीं है ह्रदय से।"सच में शिवरानी देवी का ह्रदय बड़ा ही उदार था।

Comments

Popular posts from this blog

प्रेमचंद जी का अंतिम उपन्यास गोदान के कुछ रोचक तथ्य और प्रमुख पात्र NTA-UGC NET 2020

भारतीय भाषाओं में न्यायिक प्रक्रिया